खेलो पित्तो सिंभो वमिया जिब्भामलो य दंतमलो ।
लाला जायदि तुंडम्मिणिच्चं मुत्तपुरिससुक्कमिदरत्थे॥1047॥
मुख में हों खकार पित्त कफ, दन्त-जीभमल लार वमन ।
और मूत्र विष्टा अरु वीर्य उदर में होते हैं उत्पन्न॥1047॥

  सदासुखदासजी