
सेदो जादि सिलेसो व चिक्कणो सव्वरोमकूवेसु ।
जायंति जूवलिक्खा छप्पदियासो य सेदेण॥1048॥
रोम-रोम से इस शरीर के बहे चिपचिपा नित प्रति स्वेद1 ।
जिससे लीख और जूँ होते - एेसे अवयव हैं तन के॥1048॥
अन्वयार्थ : इस देह में जो कर्ण हैं, उनमें कर्णगूथ/कर्ण मैल उत्पन्न होता है, नेत्रों में नेत्रमल और अश्रु उत्पन्न होते हैं । नासिका के पुटों में सिंहाणक/नासिका मल उत्पन्न होता है । मुख से खखार, पित्त, कफ, वमन, जिह्वामल, दंतमल और लार उत्पन्न होती है । अधोद्वारों से मूत्र, मल तथा वीर्य उत्पन्न होता है और सर्व रोमों के छिद्रों में से सचिक्कण/चिकनाई सहित पसेव निकलता है । पसेव से जुआँ, लीख तथा चर्मजुआँ उत्पन्न होते हैं ।
सदासुखदासजी