
विट्ठापुण्णो भिण्णो व घडो कुणिमं समंतदो गलइ ।
पूदिंगालो किमिणोव वणो पूदिं च वादि सदा॥1049॥
ज्यों विष्टा से भरे और फूटे घट से चहुँ ओर बहे ।
कृमि से भरे घाव से बहती पीप देह से मैल बहे॥1049॥
अन्वयार्थ : जैसे विष्टा से भरे फूटे घडे में से सर्वतरफ से दुर्गन्धमय मल ही बहता है, वैसे ही शरीर में से भी सर्व ओर से मल ही निरन्तर बहता है और जैसे कृमि से भरे व्रण/घाव में से भी दुर्गंधाधि ही बहती है, वैसा ही यह शरीर जानना ।
सदासुखदासजी