
इंगालो धोवंते ण सुज्झदि जहा मपयत्तेण ।
सव्वेहिं समुद्देहिम्मि सुज्झदि देहो ण धुव्वंतो॥1050॥
ज्यों सागर जल से धोने पर भी न कोयला होता श्वेत ।
चाहे कितना यत्न करें तन धोने पर भी शुद्ध न हो॥1050॥
अन्वयार्थ : जैसे कोयला सम्पूर्ण समुद्र के जल से बडे यत्नपूर्वक धोने पर भी उज्ज्वल नहीं होता है, उसमें से कालास ही निकलती है, तैसे ही देह को बहुत जलादि से धोने पर भी उसमें से पसेवादि मल ही निकलता है ।
सदासुखदासजी