
सिण्हाणुब्भंगुव्वट्टणेहिं मुहदंतअच्छिधुवणेहिं ।
णिच्चंपि धोवमाणो वादि सदा पूदियं देहो॥1051॥
उबटन इत्र फुलेल स्नान से, दाँत आँख मुख धोने से ।
करें स्वच्छ तो भी यह देह सदा दुर्गन्ध कुदान करे॥1051॥
अन्वयार्थ : स्नान, इतर, फुलेल, उबटन करने से, मुख, दंत, नेत्रों के धोने से तथा सदा ही स्नानादि से धोई हुई भी यह देह दुर्गंध ही वमन करती/निकालती है ।
सदासुखदासजी