
अभिभूदुव्विगंधं परिभुज्जदि मोहिएहिं परदेहं ।
खज्जदि पूइयमं संजुत्तं जह कडुगभंडेण॥1053॥
पर-तन की दुर्गन्ध दूर कर मूढ़ भोगते हैं पर-देह ।
जैसे मांसाहारी मिर्च-मसाला डाल मांस खाते॥1053॥
अन्वयार्थ : पाषाण जो रत्न, सुवर्ण, अंजन, मृत्तिका, सुगन्ध, छाल, वेल, मूल/जड तथा मुख को सुगंधित करने वाले द्रव्य, केशों को सुगंधित करने वाले तांबूल/पान, गंधमाल्य धूप, उनसे दूर की है दुर्गंध जिसकी, ऐसी पर की देह को मूढ जन अति आसक्त होकर भोगते हैं । जैसे कटुक भांड अर्थात् मिर्च, हींग इत्यादि से संस्कारित किया गया जो महादुर्गंधमय मांस उसे भक्षण करता है ।
सदासुखदासजी