
अब्भंगदीहिं विणा सभावदो चेव जदि सरीरमिमं ।
सोभेज्ज मोरदेहुव्व होज्ज तो णाम से सोभा॥1054॥
जैसे देह मोर की होती है स्वभाव से सुन्दर ही ।
त्यों सुगन्धयुत तैलादिक बिन तन सुन्दर तो कहना ठीक॥1054॥
अन्वयार्थ : मयूर नामक पक्षी की देह के समान स्नान उद्वर्तन/उबटन, तेल, फुलेल बिना स्वभाव से ही यह शरीर शोभावान होता है, वह शोभा तो सच्ची है और जो स्वयं मलिन, दुर्गंध रूप है, वह परकृत शोभा कोई शोभा है क्या?
सदासुखदासजी