जदि दा विहिंसदि णरो आलद्धुं पडिदमप्पणो खेलं ।
कधदा णिपिवेज्ज बुधो महिलामुहजायकुुणिमजलं॥1055॥
यदि बाहर में पड़े हुए निज कफ को छूने में हो ग्लानि ।
युवती के मुख की दुर्गन्धित लार पिये कैसे ज्ञानी॥1055॥
अन्वयार्थ : अपना कफ पडा हो तो स्वयं स्पर्श करने में भी बहुत ग्लानि करते हैं, तो स्त्री के मुख की लार-दुर्गंधमय बुरा जल कामी कैसे पीते हैं?

  सदासुखदासजी