अंतो बहिं च मज्झे व कोइ सारो सरीरगे णत्थि ।
एरंडगो व देहो णिस्सारो सव्वहिं चेव॥1056॥
अन्तर बाहर और मध्य में नहीं सार कुछ है तन में ।
एरण्ड वृक्ष की भाँति पूर्ण निःसारपना देखो तन में॥1056॥
अन्वयार्थ : जैसे एरंड की लकडी में कुछ भी सार नहीं, तैसे ही इस मनुष्य की देह में अन्दर, बाहर, बीच में - सारे शरीर में कहीं भी सार नहीं है ।

  सदासुखदासजी