
चमरीबालं खग्गिविसाणं गयदंतसप्पमणिगादी ।
दिट्ठो सारो ण य अत्थि कोइ सारो मणुयस्सदेहम्मि॥1057॥
चमरीबाल1, हिरन के सींग, हस्ति दाँत, अरु सर्प-मणि ।
सारभूत ये कहे गए, पर नर-तन में कुछ सार नहीं॥1057॥
अन्वयार्थ : चमरी गाय के बाल, गैंडा के सींग, हस्ती के दन्त, सर्प की मणि इत्यादि देह के अंग कोई कार्य साधने में सार रूप भी हैं, परन्तु मनुष्य के देह में तो कोई वस्तु भी सार रूप नहीं है ।
सदासुखदासजी