छगलं मुत्तं दुद्धं गोणीए रोयणा य गोणस्स ।
सुचिया दिट्ठा ण य अत्थि किंचि सुचि मणुयदेहस्स॥1058॥
छगल2-मूत्र गो दुग्ध-बैल गोरचन लोक में कहें पवित्र ।
किन्तु मनुज के इस शरीर की कोई वस्तु भी नहीं पवित्र॥1058॥
अन्वयार्थ : बकरे का मूत्र, गाय का दूध, बलद का गोरोचन - इनको लौकिक में शुचि भी कहते हैं; परन्तु मनुष्य देह में तो किंचित् भी शुचिता नहीं है । इस प्रकार देह की अशुचिता दस गाथाओं में दिखलाई ।

  सदासुखदासजी