
वाइयपित्तियसिंभियरोगा तण्हा छुहा समादी य ।
णिच्चं तवंति देहं अद्दहिदजलं व जह अग्गी॥1059॥
ज्यों चूल्हे पर रखे पात्र के जल को अग्नि गर्म करे ।
बात-पित्त-कफ जन्म रोग अरु क्षुधा तृषा श्रम तन-दुख दे॥1059॥
अन्वयार्थ : जैसे चूल्हे पर पात्र में रखे पानी को अग्नि ओंटाती है- तपाती है, तैसे ही वात, पित्त, कफ रोग तथा क्षुधा, तृषा, श्रम/खेद - ये देह को सदा ही तप्तायमान करते हैं ।
सदासुखदासजी