पं-सदासुखदासजी
जदिदा रोगा एक्कम्मि चेव अच्छिम्मि होंति छण्णउदी ।
सव्वम्मि दाइं देहे होदव्वं कदिहिं रोगेहिं॥1060॥
अगर एक ही चक्षु में हो सकते हैं छियानवे रोग ।
तो फिर इस पूरे शरीर में हो सकते हैं कितने रोग॥1060॥
सदासुखदासजी