
पीणत्थणिंदुवदणा जा पुव्वं णयणदइदिया आसे ।
सा चेव होदि संकुडिदंगी विरसा म परिजुण्णा॥1062॥
यौवन में पुष्ट स्तन वाली चन्द्र-मुखी प्रिय नेत्रों को ।
वही संकुचित अंगवती रसहीन जीर्ण झोपड़ी दिखे॥1062॥
अन्वयार्थ : इस शरीर का स्वरूप देखो । जो स्त्री पहले यौवन अवस्था में पीनस्तन/जिसके कुच पुष्ट थेऔर चन्द्रमा समान आनन्दकारी जिसका मुख था और नेत्रों को अतिवल्लभ थी, उसके स्पर्शने से तृप्ति नहीं होती थी, वही स्त्री वृद्धावस्था, रोगावस्था में, दारिद्र्य, शोकादि से दु:ख की अवस्था में कैसी हो गई? जिसके सर्व अंग संकुचित और शृंगार हास्यादि रस रहित विरस तथा कामरस रहित अत्यन्त जीर्ण कुटी के समान दिखते हैं ।
सदासुखदासजी