जा सव्वसुंदरंगी सविलासा पढमजोव्वणे कंता ।
सा चेव मदा संती होदि हु विरसा य बीभच्छा॥1063॥
यौवन के प्रारम्भ में जो सर्वांग सुन्दरी सविलासी ।
दिखे वही मरने पर ग्लानि योग्य तथा नीरस दिखती॥1063॥
अन्वयार्थ : जो स्त्री प्रथम यौवन में सर्व सुन्दर अंग को धरने वाली थी, अनेक विलास सहित थी, मनोहर थी; वही स्त्री मृतक होने पर अति विरस दिखती है, अति भयानक दिखती है । ऐसी दो गाथाओं में शरीर की तथा शरीर की कांति यौवन की अध्रुवता कही ।

  सदासुखदासजी