सा वा हवे विरत्ता महिला अण्णेण सह पलाएज्ज ।
अपलायंति व तगी करिज्ज से देमणस्साणि॥1065॥
अथवा पति से हो विरक्त वह जाती अन्य पुरुष के साथ ।
न जाये तो भी पति को दुःख देनेवाले करती कार्य॥1065॥
अन्वयार्थ : यदि मन को आह्लादकारी स्नेह की भरी रूपवती, विनयवती, यौवनवती स्त्री को छोडकर पहले स्वयं का मरण हो जाये तो मरण के समय में महान दु:ख होता है । हाय, हाय! यह स्त्री मेरे बिना कैसे जिन्दगी पूरी करेगी? और मेरे बिना इसका वांछित कार्य कौन साधेगा? तथा मुझे ऐसे संयोगों का मिलना अनेक भवों में भी नहीं होगा । ऐसा आर्तध्यान करता-करता दुर्गति में जा पडता है और यदि स्त्री का मरण पहले हो जाये तो स्वयं उसके गुणों का स्मरण करके वियोग के दु:ख से अत्यन्त तप्तायमान होता है, रात-दिन शोक में जलता हुआ विलाप करता है । हाय! उस वल्लभा को कहाँ देखूँ! अब मेरा कौन सहायी रहा? सारे कुटुम्ब में मेरा कोई नहीं । मेरा सुख-दु:ख किससे कहूँ । दसों दिशायें शून्य दिखती हैं । मेरे ऐश्वर्य का सुख किसके काम आयेगा? मेरा यश सुनकर कौन हर्षित होगा? मुझे दु:खी देख किसे दर्द-दु:ख होगा? जगत में कोई मेरा नहीं रहा! पुत्र-बांधवादि मेरे धन के ग्राहक/लेने वाले हैं, मेरा कोई नहीं । मैं असहाय हूँ, मेरे वस्त्राभरण आदि देख कौन राजी होगा? मेरी शय्या, मेरा आसन, महल, मकान, वस्त्र, आभरण को भोगने में कोई सहायी-साथी नहीं । मेरी सहचरी यदि मुझे एक घडी आया नहीं देखती तो अतिव्याकुल मृगी के समान धैर्य धारण नहीं करती थी, अब मुझे कौन याद करेगा? और मेरा अभिप्राय/अन्दर का भाव कौन पूछेगा? और यदि कदाचित् निर्धन हो जाऊँ या रोग आ जाये तो मुझे दु:ख में पूछने वाला कौन है? कोई दिखता नहीं! सारा घर भरा है तो भी स्त्री बिना ऊजड है! ग्राम-नगर शून्य दिखते हैं- इत्यादि संक्लेश परिणाम करके दुर्ध्यान को प्राप्त होकर महादु:ख से मरण कर दुर्गति में जाता है । यदि स्वयं भी जीवित है और जीवित स्त्री को कोई बलवान दुष्ट राजा या म्लेच्छ, चोर, भील जबरदस्ती से छुडा ले जायें तो इतना अधिक दु:ख और दुर्ध्यान होता है कि उसे कोई वचनों से कहने में समर्थ नहीं । यह दु:ख मरण हो जाने के दु:ख से भी अधिक है और कदाचित् अपनी स्त्री अपने से विरक्त होकर दूसरे के साथ चली जाये/लग जाये तो बहुत दु:ख होता है । यदि दूसरे पुरुष में आसक्त हो जाये तो महान दु:ख होता है । यदि आपकी आज्ञा से विपरीत प्रवर्तन करे तो दु:ख होता है । दुष्टनी हो, कलहकारिणी हो, कटुकवचन बोलने वाली तथा निर्दय परिणाम धारण करने वाली इत्यादि दु:ख देने वाली हो तो रात-दिन एक घडी भी शांति नहीं रहती, किसको कहूँ? कहाँ जाऊँ? जिसको कहूँगा, वही हँसी करेगा, यह बडी दीनता है । इत्यादि दु:ख स्त्री के निमित्त से होते हैं ।

  सदासुखदासजी