+ अब शरीर का अध्रुवपना कहते हैं- -
रूवाणि कट्ठकम्मादियाणि चिट्ठंति सारवेंतस्स ।
धणिदं पि सारवेंतस्स ठादि ण चिरं सरीरमिदं॥1066॥
काष्ठादिक में नर-नारी उत्कीर्ण किये रहते चिरकाल ।
कितनी भी सम्हाल कर लें पर देह नहीं रहती चिरकाल॥1066॥
अन्वयार्थ : काष्ठ पाषाणमय रूप तो सँभालने से बहुत काल तक टिकता है, परन्तु इस मनुष्य शरीर को अत्यन्त संस्कारित करने पर भी यह चिरकाल पर्यन्त नहीं टिकता है ।

  सदासुखदासजी