साधुं पडिलाहेदुं गदस्स सुरयस्स अग्गमहिसीए ।
णट्ठं सदीए अंगं कोढेण जहा मुहुत्तेण॥1068॥
सुरत भूप मुनि को देने आहार गया बस इतने में ।
सती नाम की रानी का तन नष्ट कोढ़ से मुहूर्त में॥1068॥
अन्वयार्थ : साधु के आहारदान के लिये गया जो सुरत नामक राजा, उसकी सती नामक पट्टरानी का अंग/शरीर कुष्ठ रोग से एक मुुहूर्त में नष्ट हो गया ।

  सदासुखदासजी