वग्घपरद्धो लग्गो मूले य जहा ससप्पविलपडिदो ।
पडिदमधुबिंदुचक्खणरदिओ मूलम्मि छिज्जंते॥1070॥
कुद्ध व्याघ्र के भय से भागा गिरा कूप जहँ सर्प निवास ।
छिन्दितमूल1 युक्त तरु की मधु बिन्दु स्वाद में या आसक्त॥1070॥

  सदासुखदासजी