बहुविग्घमूसएहिं आशामूलम्मि छिज्जंते ।
लेहदि विभयविलज्जो अप्पसुहं विसयमधुबिंदुं॥1072॥
लेकिन आशा जड़ को है बहु विघ्न-मूस निश-दिन काटे ।
फिर भी वह निर्लज्ज विषयमधु के नश्वर सुख में डूबे॥1072॥
अन्वयार्थ : जैसे निर्जन वन में कोई महादरिद्री पुरुष व्याघ्र के भय से भागा और सर्प तथा अजगर सहित एक अंधकूप में एक (वट) वृक्ष था, उसकी जड को पकड कर यह निराधार लटक गया । नीचे अजगर ने मुख फाड रखा था कि यह पुरुष गिरे तो मैं भक्षण करूँ और जिस जड के सहारे यह निराधार लटक रहा था, उस जड को सफेद आैर काले दो चूहे काटने के उद्यम में लगे हुए थे । उसी समय इसके जड पकड कर लटकने से वृक्ष हिला, उस वृक्ष में मधुमक्खियों का एक छत्ता था, उसमें से मक्खियाँ उडकर आईं और इसको काटने लगीं । उसकी घोर वेदना भोगता हुआ भी कुएँ में लटक रहा था । इसका मुख खुला था, उसमें एक बूँद शहद की आ गिरी, उस शहद की बूँद के आस्वादन/ स्वाद से सब दु:ख भूल गया । उसी समय आकाशमार्ग से एक विद्याधर विमान में बैठा जा रहा था । उसने इस पुरुष को दु:खी देख अति दयावान होकर विमान से नीचे उतरकर कुएँ के ऊपर से इसे कहा - हे भद्र! मेरा हाथ पकड लो, मैं तुम्हें विमान में बैठाकर, बहुत धन देकर तुम्हारे इच्छित स्थान को पहुँचा दूँगा, अब ढील (देर) मत करो । जिस जड को पकडकर लटक रहे हो - जिसके आधार से अब तक जी रहे हो, वह पूरी कट गई है, अब बिलकुल भी शेष नहीं रही है, वह जड टूटी कि तुम गिर जाओगे और नीचे अंधकूप में अजगर मुख फाडे बैठा है, वह निगल जायेगा; इसलिए शीघ्र मेरा हाथ पकड लो । ऐसे वचन सुनकर कुएँ में लटकने वाला पुरुष बोला - जो यह बूँद टपक रही है, उसका आस्वादन करके तुम्हारा हाथ पकड लँूगा । तब करुणावान विद्याधर ने पुन: कहा - अरे निर्लज्ज, मूर्ख! इतना अधिक दु:ख सह रहा है और मरण को भी नहीं देखता? इस बूँद में क्या स्वाद है? जड कट गई है, गिरने की तैयारी है । इस बूँद को टपकती देखता है, मगर यह तेरे मुख में नहीं आयेगी और तू नीचे अजगर के मुख में गिरकर नष्ट हो जायेगा । ऐसा बारम्बार कहने पर भी मूर्ख यही कहता है कि ये बूँद आ रही है । इसका स्वाद लेकर तुम्हारे विमान में बैठकर चलूँगा । इस प्रकार यह शहद की बूँद की आशा से देर कर रहा था, इतने में ही वृक्ष की जड कट गई और वह टूटी कि यह अजगर के मुख में जा पडा । इसी प्रकार संसारी मिथ्यादृष्टि जीव भी संसाररूपी वन में परिभ्रमण करता हुआ अंधकूप में पडा है । उसमें अजगर तो निगोद है और चतुर्गतिस्थानीय सर्प हैं और वृक्ष की जड समान इसकी आयु है तथा रात-दिन जा रहे हैं । ये ही काले और सफेद चूहों द्वारा आयुरूपी जड का काटना है, मोह की मक्खियों समान कुटुम्बियों के तथा क्षुधा-तृषा के दु:ख हैं एवं शहद की बूँद समान विषयों का सुख है । विद्याधर समान दयावान बिना कारण बांधव ये निर्ग्रन्थ गुरु हैं । ये बारम्बार उपदेश देते हैं, परन्तु शहद की बूँद की आशा के समान विषयों की तृष्णा से संसार में डूबता है, निगोद में जा पडता है । यह तीन गाथाओं का भाव कहा । ऐसा अध्रुवपना दिखलाया है ।

  सदासुखदासजी