
जह जह वयपरिणामो तह तह णस्सदि णरस्स बलरूवं ।
मंदा य हवदि कामरदिदप्पकीडा य लोभे य॥1078॥
ज्यों-ज्यों यौवन बीते नर का वैसे मन्द रूप-बल हों ।
कामुक रति मद रूप आदि भी क्रमशः मन्द मन्दतर हों॥1078॥
अन्वयार्थ : जैसे-जैसे अवस्था का परिणमन होता है, तैसे-तैसे मनुष्य का बल तथा रूप हीन होता जाता है औेर काम, रति, दर्प/मद, क्रीडा, लोभ मन्दता को प्राप्त हो जाते हैं ।
सदासुखदासजी