कुलुसीकदंपि उदगं अच्छं जह होइ कदयजोएण ।
कलुसो वि तहा मोहो उवसमदि हु वुड्ढसेवाए॥1080॥
जैसे कतक1 डालने से मैला पानी भी निर्मल हो ।
वैसे वृद्ध पुरुष सेवा से मलिन मोह भी शान्त बने॥1080॥
अन्वयार्थ : जैसे कीचड से मलिन जल भी कतक फल को डालने से स्वच्छ, उज्ज्वल हो जाता है और कर्दम नीचे दब जाता है; तैसे ही आत्मा के ज्ञान परिणाम को मलिन करने वाला मोह वृद्ध पुरुषों की संगति से तत्काल दब जाता है, ज्ञान परिणाम उज्ज्वल होता है; इसलिए जो गुणों से वृद्ध हैं, उनकी संगति से जीव का कल्याण होता है ।

  सदासुखदासजी