लीणो वि मट्टियाए उदीरदि जलासयेण जह गंधो ।
लीणो उदीरदि णरे मोहो तरुणासयेण तहा॥1081॥
ज्यों मिट्टी में छिपी गन्ध हो प्रकट नीर के मिलने से ।
त्यों मनुष्य में छिपा मोह हो प्रकट तरुण के मिलने से॥1081॥
अन्वयार्थ : जैसे मिट्टी में रही हुई गन्ध, वह जल के मिलने से व्यक्त/प्रगट हो जाती है, तैसे ही तरुण के आश्रय से मोह तीव्रता को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी