संतो वि मट्टियाए गंधो लीणो हवदि जलेण विणा ।
जह जह गुट्ठीए विणा णरस्स लीणो हवदि मोहो॥1082॥
ज्यों मिट्टी में छिपी गन्ध जल बिना उसी में लीन रहे ।
त्यों मनुष्य का मोह तरुण-संग बिना उसी में गुप्त रहे॥1082॥
अन्वयार्थ : जैसे मिट्टी में विद्यमान गन्ध, जल के बिना मिट्टी में ही गर्भित रहती है, तैसे ही तरुण की गोष्ठी/संगति बिना मनुष्य का मोह अव्यक्त ही रहता है, बाहर प्रगट नहीं होता ।

  सदासुखदासजी