तरुणो वि वुड्ढसीलो होदि णरो वुड्ढसंसिओ अचिरा ।
लज्जा संकामाणावमाण भयधम्म बुद्धीहिं॥1083॥
वृद्ध पुरुष के संग में शंका, मान-अमान तथा भय से ।
नौजवान हों वृद्ध स्वभावी लज्जा और धर्मधी1 से॥1083॥
अन्वयार्थ : वृद्ध पुरुषों की संगति करके तरुण पुरुष भी शीघ्र ही लज्जा से, शंका से, मान से, अपमान से, भय से तथा धर्मबुद्धि से वृद्धशील/उत्तम पुरुषों के समान स्वभाव वाला हो जाता है ।

  सदासुखदासजी