सुंडयसंसग्गीए जह पादुं सुंडओऽभिलसदि सुरं ।
विसए तह पयडीए संमोहो तरुणगोट्ठीए॥1085॥
मदिरा पीनेवालों को लख मद्य पान की अभिलाषा ।
त्यों मोही तरुणों का संग पा करे विषय की अभिलाषा॥1085॥
अन्वयार्थ : जैसे मद्यपान जिनके कुल में नहीं चलता - ऐसे उच्च कुल वाले भी मद्य पीने वाले की संगति से मदिरा पीने की अभिलाषा करने लगते हैं, तैसे ही संसारी जीव स्वभाव से ही मोह सहित वर्तते हैं और जिसकी इन्द्रियों की विकलता वर्त रही है - ऐसे तरुण पुरुष की संगति करके उत्तम पुरुष - त्यागी पुरुष भी विषयों की वांछा करने लगता है ।

  सदासुखदासजी