
तरुणेहिं सह वसंतो चलिंदिओ चलमणो य वीसत्थो ।
अचिरेण सइरचारी पावदि महिलाकदं दोसं॥1086॥
तरुण-संग करनेवाले का इन्द्रिय-मन चंचल होता ।
विश्वासी, स्वच्छन्द हुआ नारी कृत दोष युक्त होता॥1086॥
अन्वयार्थ : तरुण पुरुषों की संगति में जो पुरुष बसता है, उसकी इन्द्रियाँ चलायमान होती ही हैं, मन भी अनेक प्रकार के राग-द्वेष के विकल्पों से चलायमान होता है और भय, लज्जा रहित होकर विश्वास कर लेता है तथा अल्प काल में ही स्वेच्छाचारी होकर पूर्व में जो स्त्रीकृत दोष कहे गये हैं, उनको प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी