
परिहरइ तरुणगोट्ठी विसं व वुढ्ढाउले य आयदणे ।
जो वसइ कुणइ गुरुणिद्देसं सो णिच्छरइ बंभं॥1091॥
तरुण-संग को विष-सम तज वृद्धों के संग जो करे निवास ।
गुरु-आज्ञा का पालन करता ब्रह्मचर्य में करे विकास॥1091॥
अन्वयार्थ : विषयों में आसक्त तरुण पुरुष की संगति को विष समान आत्मगुणों का घातक जानकर छोडते हैं और जो ज्ञान, विनय, शील, तप से वृद्ध हैं; उनकी संगति में बसता है, वह गुरु की आज्ञा पालता है और वही ब्रह्मचर्य व्रत का निस्तार/निर्वाह करता है ।
सदासुखदासजी