
हासोवहासकीडारहस्स वीसत्थ जंपिएहिं तहा ।
लज्जामज्जादीणं मेरं पुरिसो अदिक्कमदि॥1097॥
हास और उपहास तथा क्रीड़ा एकान्त वार्तालाप ।
आपस में विश्वास आदि से लज्जा मर्यादा का त्याग॥1097॥
अन्वयार्थ : अल्प धैर्य का धारक जो मोही पुरुष, उसका स्त्री के स्तन, जंघा तथा मुख देखने से मन अत्यन्त चलायमान होता है और मन चलायमान होने के बाद लज्जा नष्ट हो जाती है । लज्जा नष्ट होने के बाद उस स्त्री को देखना, समीप में जाना, हँसना इत्यादि स्त्रियों से परिचय करना और स्त्रियों का परिचय होने के बाद मन में यह शंका नहीं होती कि इसके साथ कोई मुझे देख लेगा तो क्या कहेगा? ऐसे लज्जावान पुरुष भी क्रम से नि:शंक होकर विश्वास कर लेते हैं । इस स्त्री का मुझसे अत्यन्त प्रेम है, मेरे और इसके हित की - ममत्व की बात दूसरी जगह नहीं जायेगी - ऐसा विश्वास उत्पन्न हो जाता है । इस प्रकार अपने मन के विश्वास से स्त्री का भी विश्वास हो जाता है और ज्यों ही विश्वास बढा, त्यों ही विश्वास से स्नेह बढता है, स्नेह से रति/आसक्ति बढती है, आसक्ति के बाद परस्पर वचनालाप होने लगता है तथा बारम्बार मिलना-देखना इससे स्त्री में स्वेच्छाचारी पुरुष का मन शीघ्र ही क्षोभ को प्राप्त होता है । देखे बिना, वचनालाप किये बिना, एकांत में मिले बिना मन में चैन नहीं पडती है और स्त्रियों का स्थित रहना, गमन करना, नेत्रों के विलास, भृकुटियों का विभ्रम, हास्य चेष्टा, कटाक्ष दृष्टि, शरीर की कांति, रति, मिलाप और हास्य-उपहास, क्रीडा एकांत में विश्वास रूप वचनालाप से पुरुष लज्जा एवं कुल की मर्यादा का उल्लंघन कर देता है ।
सदासुखदासजी