जुण्णं पोच्चलमइलं रोगिय बीभस्सदंसणविवं ।
मेहुणपडिगं पच्छेदि मणो तिरियं च खु णरस्स॥1103॥
सारहीन अति वृद्धा रोगी मैल-कुचैली तथा कुरूप ।
नारी संग अथवा तिर्यंच संग भी यह मन चाहे मैथुन॥1103॥
अन्वयार्थ : तीव्र काम के परिणाम सेकामी का मन जीर्ण/वृद्ध स्त्री से भी प्रार्थना करता है और जो निस्सार हो, मलिन हो, रोग सहित हो, जिसे देखते ही भय हो - ऐसी भयानक हो, कुरूप हो तथा तिर्यंचनी हो, ऐसी स्त्री की भी कामी पुरुष वांछा करता है ।

  सदासुखदासजी