
दिट्ठाणुभूदविसयाणं अभिलाससुमरणं सव्वं ।
एसा वि होइ महिलासंसग्गी इत्थिविरहम्मि॥1104॥
देखे भोगे सुने हुए विषयों की अभिलाषा स्मरण ।
नारी के अभाव में भी ये सब ही है नारी संसर्ग॥1104॥
अन्वयार्थ : यदि स्त्री न भी हो तो भी स्त्रियों में किया गया संसर्ग कैसा है? जिससे पूर्व में देखे, सुने, अनुभव किये गये जो विषय; उनकी अभिलाषा, स्मरण तथा चिंतवन हृदय में निरन्तर बना ही रहता है - स्त्री संबंधी विषय-वासना जाती/छूटती नहीं है ।
सदासुखदासजी