थेरो बहुस्सुदो दो पच्चई पमाणं गणी तवस्सित्ति ।
अचिरेण लभदि दोसं महिलावग्गम्मि वीसत्थो॥1105॥
वृद्ध प्रसिद्ध तथा विश्वस्त प्रमाणिक गणधर या तपसी ।
नारी में विश्वस्त, करे संग हो तुरन्त अपयश भागी॥1105॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष स्त्रियों के समूह में विश्वास करता है, वह वृद्ध हो, बहुश्रुती/अनेक शास्त्रों का जानकार हो, अति प्रतीति का पात्र प्रमाणभूत हो, संघ का अधिपति हो, सर्व लोगों को मान्य हो, तपस्वी हो तो भी स्त्रियों की संगति से थोडे ही समय में अपवाद, अपयश, दुराचार को प्राप्त हो ही जाता है । जो स्त्रियों की संगति तथा स्त्रियों से वचनालाप करेगा, उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हो जायेगी, धर्म-भ्रष्ट हो जायेगा, वह ज्ञानादि सर्व गुणों से भ्रष्ट होकर संसार में ही डूब जायेगा ।

  सदासुखदासजी