किं पुण तरुणा अबहुस्सुदा य सदूरा बविगद वेसाय ।
महिला संसग्गीय णट्ठा अचिरेण हो हंति॥1106॥
तब जो तरुण अल्प ज्ञानी स्वच्छन्द और विकृत वेशी ।
नारी संग से क्यों न शीघ्र हों नष्ट? अवश्य नष्ट होते॥1106॥
अन्वयार्थ : जब ज्ञानवान वृद्ध तपस्वी भी स्त्री के संसर्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं तो तरुण/जवान और शास्त्र के ज्ञान रहित स्वेच्छाचारी, विकाररूप आभूषण, भेष-वस्त्रादि को धारण करने वाले स्त्रियों की संगति से तथा स्त्रियों से वचनालाप करने वाले क्या भ्रष्ट नहीं होंगे? भो लोक! जो स्त्रियों से किंचित् भी संसर्ग रखेगा, उसे नष्ट हुआ ही जानो ।

  सदासुखदासजी