
सगडो हु जइणिगाए संसग्गीए दु चरणपब्भट्ठो ।
गणिया संसग्गीय य कूववारो तहा णट्ठो॥1107॥
शकट मुनि जैनिका1 संग से चारित से अति भ्रष्ट हुए ।
मुनि कूपचार वेश्या संगति से चारित से भ्रष्ट हुए॥1107॥
अन्वयार्थ : सकट नामक मुनि, जैनी नामक ब्राह्मणी के संसर्ग से चारित्र से भ्रष्ट हुए और कूपचार नामक मुनि वेश्या के संसर्ग से नष्ट हुए ।
सदासुखदासजी