
जो महिला संसग्गी विसवं दट्ठूण परिहरइ णिच्चं ।
णित्थरइ बंभचेरं जावज्जीवं अकंपा सो॥1109॥
जो नारी-संग विष-सम जाने नित्य करे उसका परिहार ।
वह निश्चल होकर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेता धार॥1109॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष स्त्री का संसर्ग विष-समान जानकर सदा ही त्याग करता है, वह निष्कंप होकर जीवनपर्यंत ब्रह्मचर्य का निर्वाह करता है । भावार्थ - जो स्त्री मात्र का संसर्ग त्यागेगा, उसके निश्चल ब्रह्मचर्य होगा और जो स्त्री की संगति, स्त्री से वचनालाप तथा अवलोकन करेगा, उसका ब्रह्मचर्य नष्ट होगा ही होगा ।
सदासुखदासजी