सव्वम्मि इत्थिवग्गम्मि अप्पमत्तो सदा अबीभत्थो ।
बंभं निच्छरदि वदं चरित्तमूलं चरणसारं॥1110॥
जो समस्त महिलाओं के प्रति अविश्वस्त एवं अप्रमत्त ।
ब्रह्मचर्य व्रत पाले यह व्रत चारित का है सार स्वरूप॥1110॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष समस्त स्त्रियों के समूह में प्रमाद रहित है ओैर कभी भी स्त्रियों का विश्वास नहीं करता, दूर ही रहता है, वह पुरुष चारित्र के मूल, आचरण में सार ऐसे ब्रह्मचर्यव्रत का निस्तार करता है ।

  सदासुखदासजी