किं मे जंपदि किं मे पस्सदि अण्णो कहं च वट्टामि ।
इदि जो सदाणुपेक्खइ सो दढबंभव्वदी होदि॥1111॥
मेरे लिए लोग क्या कहते और सोचते या देखें ।
एेसा करे विचार सदा जो उसका ब्रह्मचर्य दृढ़ हो॥1111॥
अन्वयार्थ : जिसके निरन्तर ऐसा भय रहता है कि मैं स्त्री से वचनालाप करूँगा तथा राग भाव से देखूँगा तो अन्य लोग मुझे क्या कहेंगे? कैसा देखेंगे? मुझसे कैसा बर्ताव करेंगे? मुझे अत्यन्त नीच, अधम, पापिष्ठ कहेंगे, बुरा बर्ताव करेंगे- इस प्रकार का चिंतवन जिनके मन में सदा रहता है, वे पुरुष दृढ ब्रह्मचर्य के धारक होते हैं ।

  सदासुखदासजी