मज्झण्हतिक्खसूरं व इच्छिरूवं ण पासदि चिरं जो ।
खिप्पं पडिसंहरदि दिट्ठििं सो णिच्छरदि बंभं॥1112॥
जो मध्याह्न तीक्ष्ण सूर्य-सम देखे नहीं देर तक रूप ।
नारी से निज दृष्टि हटाए वह पाले व्रत ब्रह्म-स्वरूप॥1112॥

  सदासुखदासजी