एवं जो महिलाए सद्दे रूवे तहेव संफासे ।
ण चिरं सज्जदि दु मणं खु णिच्छरदि सो बंभं॥1113॥
इसप्रकार नारी के शब्द रूप स्पर्शन में चिर-काल ।
नहीं ठहरता जिसका मन वह ब्रह्मचर्य को लेता पाल॥1113॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष मध्याः काल के तीक्ष्ण सूर्य के समान स्त्री के रूप को स्थिरचित्त रागरूप होकर नहीं देखते हैं, नजर पडते ही तत्काल अपनी दृष्टि संकोच लेते हैं, नेत्र बंद कर लेते हैं, वे ब्रह्मचर्य का निस्तार करते हैं और इसी प्रकार स्त्री के शब्द सुनने में, रूप देखने में तथा स्पर्श करने में जिनका मन चिरकाल नहीं लगता - लगता ही नहीं, वे पुरुष ब्रह्मचर्यव्रत का निर्वाह करते हैं । ऐसे ब्रह्मचर्य नामक महा-अधिकार में स्त्री संसर्ग करने से जो दोष लगते हैं, उनका वर्णन बाईस गाथाओं में किया ।

  सदासुखदासजी