+ अब जो स्त्रियों के वश नहीं होते, उनकी महिमा का दश गाथाओं में उपदेश करते हैं- -
इह परलोए जदि दे मेहुणविस्सुत्तिया हवे जण्हु ।
तो होहि तमुवउत्तो पंचविधे इत्थिवेरग्गे॥1114॥
इस भव पर-भव में यदि होवें मैथुन सेवन के परिणाम ।
इन पाँचों स्त्री-वैराग्य भाव से मन की कसो लगाम॥1114॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! इस लोक संबंधी तथा परलोक में जो तुम्हारे मैथुन के परिणाम हुए हैं - पाप के उदय से ब्रह्मचर्य में नहीं रहते हैं तो तुम स्त्रीकृत दोष, मैथुनकृत दोष, संसर्गकृत दोष, शरीर की अशुचिता तथा वृद्धसेवा - ये पाँच प्रकार, स्त्रियों से विरक्त करने के कारण कहे, इनमें उपयुक्त/मन लगाओ, इससे तुम्हारे परिणाम कामवासना से छूटकर ब्रह्मचर्य में दृढ होंगे ।

  सदासुखदासजी