
उदयम्मि जायवड्ढिय उदएण ण लिप्पदे जहा पउमं ।
तह विसएहिं ण लिप्पदि साहू विसएसु उसिओ वि॥1115॥
जल से हो उत्पन्न उसी में बढ़े कमल पर रहे अलिप्त ।
त्यों विषयों के बीच रहें पर साधु न होते उनसे लिप्त॥1115॥
अन्वयार्थ : जैसे जल में उत्पन्न हुआ, जल में ही वृद्धि को प्राप्त हुआ जो कमल, वह जल में लिप्त नहीं होता, तैसे ही जो साधु/सज्जन हैं, वे विषयों में वर्तते हुए भी विषयों में लिप्त नहीं होते ।
सदासुखदासजी