
उग्गाहिंतस्सुदधिं अच्छेरमणोल्लणं जह जलेण ।
तह विसयजलमणोमच्छेरं विसयजलहिम्मि॥1116॥
सागर में अवगाहन कर भी भीगे नहीं अहो आश्चर्य ।
विषय-समुद्र मध्य रहकर भी रहे अलिप्त महा आश्चर्य॥1116॥
अन्वयार्थ : जैसे समुद्र में अवगाहन/प्रवेश करे और समुद्र के जल से आर्द्रपना न हो - गीला न हो, यह बडा आश्चर्य है, तैसे ही विषयरूप समुद्र में वास करने वाला कोई पुरुष विषयरूपी जल से लिप्त न हो, यह बडा आश्चर्य है ।
सदासुखदासजी