+ अर्थ - जैसे समुद्र में अवगाहन/प्रवेश करे और समुद्र के जल से आर्द्रपना न हो - -
मायागहणे बहुदोसमावए अलियदुमगणे भीमे ।
असुइतणिल्ले साहू ण विप्पणस्संति इत्थिवणे॥1117॥
नारी वन, माया से है अति गहन, दोष जन्तु का वास ।
झूठ वृक्ष भयकारी, तन-तृण में न भटकते साधु पुरुष॥1117॥
अन्वयार्थ : यह स्त्रीरूपी वन मायाचार के द्वारा गहन है, जिसमें प्रवेश नहीं दिखता और बहुत ईर्ष्या, चपलता, पिशुनता इत्यादि दोष हैं ही; दुष्ट जीव उनसे व्याप्त है तथा झूठ रूप वृक्षों के समूह हैं एवं इस लोक में भी भयानक और परलोक में भी भयानक और अशुचितारूप तृणों से व्याप्त ऐसे स्त्रीरूपी वन में साधुजन अपने को भूल कर नष्ट नहीं होते ।

  सदासुखदासजी