
सिंगारतरंगाए विलासवेगाए जोव्वणजलाए ।
विहसियफेणाए मुणी णारिणईए ण बुज्झंति॥1118॥
यौवन जल, शृंगार तरंगें, वेग विलास, नदी नारी ।
हास्य फेन यह नदी मुनि को अपने में न डुबा सकती॥1118॥
अन्वयार्थ : शृंगाररूप हैं तरंगें जिसमें, विलासरूप है वेग जिसमें, यौवनरूप है जल जिसमें और मंद हास्यरूप है झाग जिसमें - ऐसी नारीरूपी नदी में मुनीश्वर नहीं डूबते हैं । यह नारीरूपी नदी उत्तम मुनियों के चित्त को नहीं बहा सकती है ।
सदासुखदासजी