महिलावाहविमुक्का विलासपुंक्खा कडक्खदिट्ठिसरा ।
जण्ण वधंति सदा विसयवणचरं सो हवइ धण्णो॥1120॥
विषय-विपिन में नारी व्याध1 कटाक्ष-बाण से नहीं बिंधा ।
जो नर-वनचर बचकर विचरे उसको ही है धन्य कहा॥1120॥
अन्वयार्थ : नारीरूपी पारधी द्वारा छोडा गया और विलासरूप हैं पंख जिसमें, ऐसे कटाक्षदृष्टि रूपी बाण जिनको विषयरूपी वन में प्रवर्तते को किसी काल में भी नहीं घातते हैं, वे धन्य हैं ।

  सदासुखदासजी