
विव्वोगतिक्खदंतो विलासखंधो कडक्कदिट्ठिणहो ।
परिहरदि जोव्वणवणे जमित्थिवग्घो तगो धण्णो॥1121॥
भृकुटि विकार हैं तीक्ष्ण दाँत, कन्धे विलास नख तिरछे नेत्र ।
यौवन वन में जिसे न पकड़े नारी व्याघ्र वही है धन्य॥1121॥
अन्वयार्थ : अनेक प्रकार के भृकुटी के विभ्रम ही हैं तीक्ष्ण दन्त जिसके और नेत्रों के विलास ही हैं स्कन्ध जिसके तथा कटाक्षदृष्टि ही हैं नख जिसके, ऐसे स्त्रीरूपी व्याघ्र ने जिसको यौवनरूपी वन में घात नहीं किया, वह धन्य है ।
सदासुखदासजी