तेल्लोक्काडविडहणो कामग्गी विसयरुक्खपज्जलिओ ।
जोव्वणतणिल्लचारी जं ण डहइ सो हवइ धण्णो॥1122॥
विषय वृक्ष से प्रजलित यह कामाग्नि जलाती है वन-त्रय ।
यौवन तृण पर चले चतुर नर जले नहीं, है धन्य वही॥1122॥
अन्वयार्थ : त्रैलोक्यरूपी वन को दग्ध करती हुई और विषयरूपी वृक्षों को प्रज्वलित करने वाली ऐसी कामरूपी अग्नि है । वह यौवनरूपी तृणों में गमन करते हुए जिस पुरुष को नहीं जलाती है, वह पुरुष धन्य है ।

  सदासुखदासजी