विसयसमुद्दं जोव्वणसलिलं हसियगइपेक्खिदुम्मीयं ।
धण्णा समुत्तरंति हु महिलामयरेहिं अच्छिक्का॥1123॥
विषय-उदधि में यौवन जल अरु लहरें उठती नारी-हास्य ।
नारी मगरमच्छ से बचकर तरें उदधि जो वे नर धन्य॥1123॥
अन्वयार्थ : यह विषयरूपी समुद्र है, उसमें यौवनरूपी जल है और स्त्रियों के हास्य, गमन तथा अवलोकन - ये ही जिसमें लहरें हैं । ऐसे विषयरूपी समुद्र को जो स्त्रीरूपी मगरमच्छों से स्पर्शन नहीं किये गये - ग्रहण नहीं किये गये, वे समुद्र से तिर जाते हैं, वे ही धन्य हैं । भावार्थ - विषयरूपी समुद्र में स्त्रीरूपी मगरमच्छ बसते हैं । जो ऐसे समुद्र में स्त्रीरूपी मगरमच्छ से बचकर पार उतर गये, वे धन्य हैं ।

  सदासुखदासजी