
अब्भंतरबाहिरए सव्वे गंथे तुमं विवज्जेहि ।
कदकारिदाणुमोदेहिं कायमणवयण जोगेहिं॥1124॥
बाह्याभ्यन्तर सर्व परिग्रह का तुम करो क्षपक! परित्याग ।
कृत-कारित-अनुमोदन एवं मन-वच-तन से करना त्याग॥1124॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! तुम अभ्यन्तर और बाह्य सर्व ही परिग्रह का मन, वचन, काय, कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करो ।
सदासुखदासजी