मिच्छत्तवेदरागा तहेव हासादिया य छद्दोसा ।
चत्तारि तह कसाया चउदस अब्भंतरा गंथा॥1125॥
मिथ्यात्व वेद अरु राग हास्य रति अरति जुगुप्सा भय अरु शोक ।
अनन्तानुबन्धी चतुष्क ये चौदह परिग्रह हैं अन्तरंग॥1125॥
अन्वयार्थ : वस्तु के यथार्थ श्रद्धान का अभाव, वह मिथ्यात्व है॥1॥ स्त्री के विषय में, पुरुष के स्पर्शनादि विषय में और नपुंसक के अंगादि के स्पर्श में तथा स्त्री-पुरुष दोनों से रमने में जो रागपूर्वक आसक्तता - ये तीन वेद हैं॥3॥ हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा - ये छह नोकषाय ॥6॥ क्रोध, मान, माया, लोभ - ये चार कषाय॥4॥ ये चौदह अभ्यन्तर परिग्रह हैं ।

  सदासुखदासजी